
पत्रकार रमण रावल ने अंगदान अभियान को लेकर हिन्दी में पहली किताब लिखी है। यह किताब इंदौर में अंगदान को लेकर चल रहे अभियान को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। किताब का पूरा नाम अंगदान : विचार-विजेता-विधि है। भारत में अंगदान करने वालों की संख्या कुछ उन्नत देशों की दुनिया में काफी कम है। अगर भारत में अंगदान करने वालों की संख्या बढ़ जाए, तो हजारों मरीजों की मदद की जा सकती है।
इस किताब के अनुसार भारत में अंगदान करने वालों की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही है। किताब के अनुसार इंदौर अंगदान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। यह कार्य किसी चमत्कार से कम नहीं है, जिसे इंदौर के लोग किसी लालच या मजबूरी में नहीं कर रहे हैं, बल्कि जन कल्याण के लिए नि:स्वार्थ भाव से कर रहे हैं। इंदौर में इसके लिए एक संस्था भी बनाई गई है, जिसका नाम है इंदौर सोसायटी ऑफ ऑर्गन डोनेशन। इंदौर के लोगों की बदौलत ही केवल सात महीने में इंदौर में होने वाले अंगदान और देहदान की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इंदौर देश में नंबर वन स्थिति में आ गया है। इसके बाद भी भारत में अंगदान करने वालों की संख्या केवल 0.05 प्रतिशत ही है; जबकि स्पेन में 34.4, अमेरिका में 21.9, ब्रिटेन में 15.5, स्वीडन में 13.8, पौलैंड में 11, संयुक्त अरब अमिरात में 3.3 और ईरान में 2.9 प्रतिशत है।
इंदौर में एक साल के भीतर दस बार ग्रीन कॉरिडोर बनाकर प्रत्यारोपण के लिए अंगों को दिल्ली, मुंबई और इंदौर के ही दूसरे अस्पतालों को भेजा गया है। इंदौर में किडनी, आंखें और त्वचा का प्रत्यारोपण तो हो रहा है, लेकिन यहां हार्ट, लीवर और बॉन मेरो (अस्थि मज्जा) का प्रत्यारोपण करने की सुविधाएं नहीं है। मेदांता अस्पताल की इंदौर इकाई को हार्ट प्रत्यारोपण के लिए अनुमति दे दी गई है। सीएचएल अस्पताल में भी हार्ट के प्रत्यारोपण और चोइथराम अस्पताल में लीवर के प्रत्यारोपण में अनुमति की प्रक्रिया चल रही है। इंदौर के एक निजी मेडिकल कॉलेज के पास लीवर के ट्रांसप्लांट की अनुमति तो है, लेकिन सुविधाएं नहीं होने से उसका उपयोग नहीं किया जा सका।

कोई भी व्यक्ति जीवित रहते अपना खून, एक किडनी, लीवर का कुछ हिस्सा, फेफड़ों का कुछ हिस्सा, आंत का हिस्सा और बॉन मेरो जैसे अंग दान कर सकता है। मृत्यु होने पर आंखें और त्वचा दान की जा सकती है। वेंटीलेटर पर आईसीयू में रहते हुए अगर कोई ब्रेन डेड हो जाए, तो उसकी आंखें (कार्निया), त्वचा, दोनों किडनियां, दिल, आंत, लीवर, फेफड़े, पेनक्रियाज और हड्डियां प्रत्यारोपित करने के लिए दान की जा सकती है। अंगदान करने वाला अपने पति-पत्नी, संतान, पोता-पोती, अभिभावक या दादा-परदादा को अंगदान कर सकता है। अगर अंगदान लेने वाला चिकित्सकीय रूप से असमर्थ हो यानी अगर अंग मैच न करता हो, तो किसी दूसरे व्यक्ति का अंग भी लिया जा सकता है। अंगदान के अलावा मृत देह का दान भी किया जा सकता है। इंदौर में सितंबर महीने तक कुल 31 लोग देहदान कर चुके है। जिनका उपयोग चिकित्सा शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों के लिए होता है।
रमण रावल की इस किताब में अंगदान और देहदान से संबंधित जानकारियों के साथ ही इंदौर के अस्पतालों के बारे में भी जानकारी दी गई है। अंगदान कब किया जा सकता है और कब नहीं, इसके बारे में भी स्पष्ट जानकारी है और अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित करने वाले लोगों के बारे में भी सूचनाएं समाहित है। इंदौर में ही आई बैंक के रूप में कार्य कर रही एम.के. इंटरनेशनल संस्था की भी जानकारी दी गई है, जो नेत्रदान के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही है। इस केन्द्र को चलते सात वर्ष हो चुके है। पुस्तक में देहदान, कार्निया, त्वचा, किडनी, दिल, फेफड़े, यकृत और पेनक्रियाज का दान करने वाले के बारे में भी जानकारी दी गई है। पुस्तक के अनुसार 2 लाख 50 हजार किडनी, करीब 50 हजार दिल, करीब 80 हजार लीवर और करीब 1 लाख कार्निया की जरूरत है, जिसमें से केवल 5 हजार किडनी, 30 ह्रदय, 700 लीवर और केवल 25 हजार कार्निया ही उपलब्ध हो सके है। अगर किसी का शरीर ब्रेन डेड हो जाए, तो तीन घंटे के भीतर उसके दिल का उपयोग किसी और व्यक्ति के लिए किया जा सकता है। ब्रेन डेड व्यक्ति का फेफड़ा 10 घंटे के भीतर, लीवर का प्रत्यारोपण 12 घंटे के भीतर, किडनी का प्रत्यारोपण 24 घंटे के भीतर, कार्निया का प्रत्यारोपण 15 दिन के भीतर और त्वचा का प्रत्यारोपण 5 वर्ष के भीतर किया जा सकता है।
अंगदान के बारे में जानकारी चाहने वालों के लिए यह पुस्तक निश्चित ही उपयोगी है। 116 पृष्ठ की किताब का मूल्य केवल 100 रुपए रखा गया है। बातों को ग्रॉफिक्स के जरिये सुंदर तरीके से समझाया भी गया है। जरूरतमंद लोगों के लिए यह पुस्तक वरदान से कम नहीं।