
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन की विदाई होते ही आरबीआई भारत में इस्लामिक बैंकिंग के दरवाजे खोलने जा रही है। इस्लामिक बैंकिंग की पहली शाखा गुजरात में खुलने की संभावना है। भारत में हिन्दुओं के बाद सबसे बड़ी आबादी मुस्लिमों की है और धार्मिक कारणों से इस्लाम में ब्याज लेना और देना दोनों ही मना है। अभी तक भारत में इस्लामिक बैंकिंग के दरवाजे इसलिए नहीं खुल पाए थे कि भारतीय कानून और नियमों के अनुसार बैंकें बगैर आर्थिक लाभ/हानि के कोई कारोबार नहीं कर सकती। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के एक व्यावसायिक गतिविधि माना गया है। इसलिए भी इस्लामिक बैंकिंग के द्वार अब तक बंद थे।
अब तक भारत में इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत कई कारणों से नहीं हो सकी। सबसे बड़ी बाधा तो इसमें आरबीआई के नियम-कानून थे और दूसरी बाधा थी अनेक हिन्दू संगठनों और सुब्रमण्यम स्वामी का विरोध। रघुराम राजन पर भी स्वामी का एक आरोप यहीं था कि वह पिछले दरवाजे से इस्लामिक बैंकिंग को लाना चाहते थे, लेकिन तमाम विरोध को धता बताकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के अपने साथी जफर सरेशवाला की सलाह को तवज्जो दी। नतीजा यह है कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग का आगमन हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस्लामिक बैंकिंग के स्वागत को लेकर एक नया विवाद बैंकिंग सेक्टर में शुरू हो गया है। मोदी विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया है कि इस्लामिक बैंकिंग भारत में इस्लामीकरण की शुरूआत करेगा। 1969 में रबात में हुए इस्लामिक देशों के प्रमुखों के सम्मेलनों में यह निर्णय लिया गया था कि विश्व में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए भी बैंकिंग व्यवस्था का उपयोग किया जाए। इसके बाद सऊदी अरब के जेद्दाह में पहला इस्लामिक विकास बैंक स्थापित किया गया। उसके बाद कई देशों में इस्लामिक बैंक खुुले। इन बैंकों की गतिविधियों की निगरानी करने के लिए मुस्लिम धार्मिक विद्वानों का शरई बोर्ड बनाया गया, जो इस बात का फैसला करता है कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए इस्लामिक बैंकें कौन-से तरीके अपनाए।
सऊदी अरब का प्रमुख सरकारी बैंक है इस्लामिक विकास बैंक। शरीयत के मुताबिक ब्याज की कमाई नाजायज है और यह बैंक शरीयत कानून के हिसाब से काम करता है, इसलिए यहां रुपए जमा कराने पर बैंक कोई ब्याज नहीं देता। इसी के साथ जब यह बैंक किसी को कर्ज देता है, तब उससे भी ब्याज नहीं लिया जाता। बैंक जिसे भी कर्ज देता है, उसकी संपत्ति गिरवी रखने के बजाय बैंक उसका हिस्सेदार बन जाता है। मान लीजिए किसी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए कर्ज लिया, तो बैंक उस कारोबार में हुए मुनाफे में से अपना हिस्सा लेगा। अगर यह बैंक किसानों के लिए खाद-बीज के लिए कर्ज देता है, तो फसल आने पर किसान के मुनाफे में से बैंक का भी एक हिस्सा होगा, लेकिन अगर फसल बर्बाद हो जाए, तो यह बैंक किसान की जमीन नीलाम नहीं करता, बल्कि घाटे में से अपना हिस्सा खुद भुगतता है। किसान की जमीन किसान के पास ही रहती है।

इस्लामिक बैंक शरीयत के हिसाब से काम करते है। इसलिए ये बैंक वहीं काम कर सकते है, जो शरीयत के अनुसार जायज है। सिनेमा खोलने, क्लब चलाने, तम्बाकू-शराब आदि का व्यापार करने, केसिनो खोलने, पोर्क का कारोबार करने और हथियारों के कारखाने खोलने आदि के लिए इस्लामिक बैंक कर्ज नहीं देते। इसका मतलब यह हुआ कि शराब कंपनियों के मालिक विजय माल्या जैसों को इस्लामिक बैंकों से चवन्नी का भी कर्ज नहीं मिलता।
दुनियाभर में करीब पांच सौ इस्लामिक बैंक है और यह बैंकें एक लाख करोड़ डॉलर का लेन-देन कर रहे है। अगले पांच साल में यह राशि इसके दोगुने होने की संभावना है। इस्लामिक बैंक अभी खाड़ी देशों के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, जापान आदि में भी खूब चल रहे है। चीन ने तो हांगकांग को इस्लामिक बैंकिंग का गढ़ बना रखा है। यूरोप के कई देशों में इसे इंटरेस्टलेस बैंकिंग, अल्टरनेटिव बैंकिंग, सोशल रेस्पांसिबल बैंकिंग, एथिकल बैंकिंग आदि कई तरह के नाम दिये हैं। एचएसबीसी (हांगकांग एंड संघाई बैंकिंग कार्पोरेशन लिमिटेड) बैंक ने इस्लामिक बैंकिंग को अमाना और सिटी बैंक ने सादिक विंडो का नाम दिया है। भारत में भी इन बैंकों ने अमाना और सादिक खातों में धन जमा करने पर ब्याज नहीं मिलता। ये बैंक इस तरह के ग्राहकों से किसी भी तरह का सेवा शुल्क नहीं लेते। क्रेडिट कार्ड पर इन खाता धारकों को कोई ब्याज भी नहीं देना पड़ता। बैंकिंग सुविधाओं के लिए इन खाताधारकों से शुल्क नहीं लिया जाता।

इस्लामिक बैंकों में इंफ्रांस्ट्रक्चर के लिए सुकूक फंड के नाम से अरबों रुपए जमा है। इस्लामिक बैंकों के इस फंड को लेने वाले नहीं मिल रहे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के विकास के लिए बड़े पैमाने पर धन की कमी महसूस कर रहे है। अभी भारत में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए वल्र्ड बैंक और एडीबी (एशियन डेवलपर बैंक) से अरबों डॉलर का कर्ज ले रखा है। यह कर्ज बड़े-बड़े बंदरगाह, सिंचाई परियोजनाएं और बिजलीघरों के लिए लिया गया है। अब प्रधानमंत्री चाहते है कि इस्लामिक बैंकों से बिना ब्याज का सुकूक फंड लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में लगाया जाए और साथ ही छोटे किसानों, बुनकरों और दस्तकारों के लिए भी धन इकट्ठा किया जाए। आरबीआई के लिए बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 में कुछ बदलाव भी कर सकती है। इस्लामिक बैंकिंग में इजारा (लीजिंग) के लिए भी फंडिंग की व्यवस्था है।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का विरोध करने वालों में सुब्रमण्यम स्वामी का नाम प्रमुख है। स्वामी का आरोप था कि रघुराम राजन पिछले दरवाजे से इस्लामिक बैंकिंग का रास्ता खोल रहे हैं। स्वामी के अनुसार यह भारतीय हित में नहीं है। इस्लामिक बैंक मुख्यत: मुस्लिम समुदाय के उत्थान के लिए है आज जबकि इस्लामिक कट्टरपंथियों ने दुनियाभर में लोगों की नींद हराम कर रखी है, ऐसे में अगर इस्लामिक बैंकिंग का प्रभाव ब़ढ़ा, तो इस धार्मिक कट्टरपंथ से निपटना कठिन होगा। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इस्लामिक बैंकों के कर्ज का इस्तेमाल गैर-मुस्लिमों को इस्लाम कबूल करवाने के लिए लालच के रूप में भी किया जा सकता है। यह भी आशंका है कि इस्लामिक बैंकों की शाखाओं का इस्तेमाल आतंकवादियों की फंडिंग के लिए भी हो सकता है। रघुराम राजन समिति के सामने 2012 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने इस्लामिक बैंकिंग की वकालत जोर-शोर से की थी। मनमोहन सिंह की सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए. रहमान खान ने भी इस्लामिक बैंकिंग लागू करने की वकालत की थी और अनेक मुस्लिम सांसदों ने उनका साथ दिया था।

केरल हाईकोर्ट ने केरल में सबसे पहले इस्लामी बैंक खोलने की अनुमति दी। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद केरल की सरकार ने इसके लिए एक त्रिपक्षीय निगम गठित करने का प्रयास किया था, तब भी सुब्रमण्यम स्वामी ने उसका विरोध किया था। स्वामी को लगता है कि इस्लामिक बैंकों को अनुमति देना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। 2007 में आरबीआई के तत्कालीन कार्यकारी निदेशक आनंद सिन्हा के नेतृत्व में एक वर्किंग ग्रुप ने इस्लामिक बैंकों को खोलने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बार का भी कहना था कि इस्लामिक बैंकिंग भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में लागू करना संभव नहीं है।
जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने अल्पसंख्यकों के आर्थिक विकास के लिए सभी सरकारी बैंकों को यह निर्देश दिया था कि जब भी वे कर्ज दें, तब अल्पसंख्यक समुदाय का विशेष ध्यान रखें। डॉ. नजमा हेपतुल्ला ने भी अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय संभालते हुए राष्ट्रीय बैंकों को यहीं कहा था कि मुसलमानों को स्वरोजगार शुरू करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज दिया जाए और वह भी बहुत कम ब्याज की दर पर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अब मनमोहन सिंह की सरकार की नीतियों पर ही चल रहे है। करीब 20 साल की कड़ी मेहनत के बाद अब अहमदाबाद में इस्लामिक बैंक की शाखा शुरू की जा रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इस तरह की बैंकिंग का विरोध कर रहा है। संघ परिवार का मानना है कि इस तरह की बैंकिंग अल्पसंख्यकों के पुष्टिकरण का ही एक नमूना है।
यह माना जाता है कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग की शुरूआत के पीछे अहमदाबाद के मुस्लिम व्यवसायी जफर सरेशवाला की प्रमुख भूमिका है। जफर सरेशवाला 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद भी नरेन्द्र मोदी के साथ लगातार बने हुए हैं। यहां तक कि जब नरेन्द्र मोदी पर मुस्लिमों के प्रति घृणा फैलाने जैसे आरोप लगे, तब भी जफर सरेशवाला मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। गुजरात के दंगों में जफर सरेशवाला की संपत्ति जला दी गई, लेकिन फिर भी उन्होंने मोदी का साथ नहीं छोड़ा। प्रधानमंत्री मोदी पर अब संघ परिवार की ओर से इस तरह के आरोप भी लग रहे है कि प्रधानमंत्री मोदी भी कांग्रेस के तुष्टिकरण अभियान को ही आगे बढ़ा रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता का कहना है कि अगर कोई मुझे कहे कि मुझे किसी व्यवसाय में एक करोड़ रुपए का निवेश करना है और मुझे कोई ब्याज नहीं मिलेगा, लेकिन नफे या नुकसान में मेरी बराबर की हिस्सेदारी होगी, तो मैं भी इस तरह के निवेश से पीछे नहीं हटूंगा।

भारत में इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक, नॉन बैंकिंग फायनेंस की शाखा खोलने जा रहा है, जिसमें दो सौ करोड़ रुपए की विदेशी पूंजी आ रही है। अपनी जेद्दाह यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने जो समझौते किए थे, उसमें चार सौ करोड़ रुपए के एक निवेश का भी समझौता हुआ था। इसके अलावा एक्सपोर्ट, इम्पोर्ट बैंक ने निवेश के लिए दस करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन की भी व्यवस्था की गई है। इस्लामिक बैंकिंग के समर्थन में केवल मुस्लिम समुदाय के लोग ही हो, ऐसा नहीं है। बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के भी कई बुद्धिजीवी इस तरह की बैंकिंग का समर्थन करते हैं, उनका कहना है कि छोटे और मध्यम आकार के उद्योगों को धन की कमी इस तरह के बैंकों से पूरी हो सकती है। इस्लामिक बैंकिंग में केवल मुसलमानों को ही कर्ज नहीं दिया जाता, सभी को कर्ज दिया जाता है। यूरोप के कई देशों में जहां इस्लामिक बैंकिंग चल रही है, वहां गैर मुसलमान भी इस्लामिक बैंकिंग का फायदा उठा रहे है।
भारत में इस्लामिक बैंकिंग के लिए प्रधानमंत्री को मनाने वालों में जफर सरेशवाला प्रमुख व्यक्ति है, जिनसे नरेन्द्र मोदी अच्छे खासे प्रभावित हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी ने जफर सरेशवाला को मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय का चांसलर बनाया। जफर सरेशवाला का कारोबार भारत के अलावा ब्रिटेन में भी प्रमुख रूप से फैला हुआ है। इस्लामिक बैंकिंग ने ही जफर सरेशवाला के कारोबार को आगे बढ़ाने में प्रमुख सहायता दी थी। प्रधानमंत्री को प्रभावित करने की बात पर जफर सरेशवाला का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यापारिक बुद्धि को प्रभावित करना किसी के भी बस की बात नहीं है। प्रधानमंत्री जानते है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। मैं उन्हें समझाने वाला कौन होता हूं?

20 SEPT. 2016