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‘दाग अच्छे हैं’ यह एक वाशिंग पावडर का विज्ञापन कहता है। दुर्भाग्य से इसे पत्रकारों ने भी अपना लिया है। अब दागदार होना पत्रकारिता में कोई बुरी बात नहीं मानी जाती। हद तो यह है कि अब दागदार लोग अपने दागदार होने पर फख करते हैं। दागदारों को विशेष सम्मान देने की कोशिश की जा रही है। ताजा उदाहरण है तरुण तेजपाल का।

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तरुण तेजपाल की वेबसाइट पर जिस तरह से उनकी शहादत और बलिदानों का जिक्र है, वह उतना अटपटा नहीं लगता, क्योंकि यह तो उन्हीं का काम है। हद तो यह हो गई कि अब मास मीडिया में भी तरुण तेजपाल जैसों की वाहवाही की कोशिशें की जा रही है। ताजा उदाहरण है अंग्रेजी के मिड-डे अखबार का।

मिड-डे ने तरुण तेजपाल के बारे में एक लेख प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है ‘टाइम फॉर ए रि थिंक’। इस लेख में तरुण तेजपाल के बारे में कहा गया कि वे एक सेलेब्रिटी राइटर हैं। तहलका के सम्पादक के रूप में ख्यातिप्राप्त व्यक्ति रहे हैं। अब वे एक नई पत्रिका शुरू करने जा रहे हैं। यह भी चर्चा में है कि वे अपनी वेब पत्रिका को नया स्वरूप प्रदान करेंगे। यहां तक तो बातें समझ में आती है, लेकिन यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि वे अपने स्टाफ की पत्रकार के साथ यौन अपराध के आरोपी है। भारतीय कानून में इसे बलात्कार कहा जा सकता है।

इस सबके बावजूद मिड-डे अपने लेख में लिखता है कि तरुण तेजपाल की ‘एक गलती के कारण’ (अखबार के अनुसार वह रेप की कोशिश नहीं, एक गलती थी) उनके खिलाफ ‘अनवरत मीडिया अभियान’ चलाया जा रहा है और उनकी ‘प्रतिष्ठा को पाताल में पहुंचाने की कोशिश’ की जा रही है। उनके काम की ‘समीक्षा के बहाने उनके खिलाफ लगातार गोला बारूद फेंका जा रहा है’ और उन्हें ‘तबाह करने की कोशिश’ की जा रही है।

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क्या मिड-डे यह कहना चाहता है कि तरुण तेजपाल शहीद हैं? उसने कोई मामूली सी गलती की है? जैसे रांग साइड में गाड़ी पार्क कर दी या रेड सिग्नल की अनदेखी कर दी। तरुण तेजपाल की महान पत्रकारिता के कारण उसके खिलाफ षड्यंत्र किया जा रहा है? क्या कहना चाहता है मिड-डे?

एक पत्रकार ने तरुण तेजपाल की इमेज चमकाने के प्रयास की तुलना अमेरिका के स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की एक घटना से की है। वहां ब्राक टर्नर नामक एक छात्र ने विश्वविद्यालय परिसर में ही एक लड़की के साथ बलात्कार किया था। जब उसे सजा दी गई तब बलात्कारी के पिता ने जज को लिखा- ‘‘मेरे बेटे को छोड़ दीजिए। क्योंकि वह बहुत ही शानदार खिलाड़ी है, वह अच्छा छात्र है और बहुत अच्छा बच्चा है।’’ ऐसी ही अपील मिड-डे करना चाहता है। मिड-डे के इस लेख में लेखक की जगह किसी का नाम नहीं है। शायद लिखने वाले को भी शर्म आ रही होगी और वह किसी दबाव में लिख रहा होगा। यह भी हो सकता है कि उसे इस बात का एहसास हो कि जब यह बकवास छापी जाएगी, तब लोगों के मन में कितना गुस्सा उबल रहा होगा।

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इसमें दो मत नहीं कि तरुण तेजपाल अच्छे पत्रकार और लेखक हैं, लेकिन अच्छा पत्रकार और लेखक होना किसी को भी यौन अपराध करने का अधिकार नहीं दे देता। नोबेल सम्मान प्राप्त आर.के. पचौरी को भी नहीं। तरुण तेजपाल ने इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस, आउटलुक और तहलका जैसी पत्रिकाओं में प्रमुख भूमिका निभाई। एशिया वीक ने उन्हें 2001 में एशिया के सबसे प्रभावशाली सम्पादकों में चुना था। गार्जियन ने 2007 में उनकी गिनती भारत के 20 नामचीन लोगों में की थी। 2009 में बिजनेस वीक ने उनको भारत के 50 सबसे ताकतवर लोगों में गिना था। उनके पहले उपन्यास की ही गिनती मास्टरपीस में होने लगी थी। नोबेल साहित्य विजेता वीएस नॉयपाल ने उनके उपन्यास को भारत का श्रेष्ठतम ओरिजनल उपन्यास कहा था। उनका दूसरा उपन्यास भी काफी चर्चा में रहा, लेकिन 2013 में उन्होंने जो कृत्य किया, उससे उनकी छवि धूल में मिल गई। अब वह जमानत पर है और अपनी दुकान जमाने की कोशिश कर रहा है।

तरुण तेजपाल तो महज एक नमूना है, जो बड़े नाम होने के कारण लोगों की निगाह में आ गया है। उसके जैसे दागदार पत्रकार तो आजकल प्रदेश की राजधानियों और जिलों में भी देखने को मिल जाते हैं। अपराध का अंतर हो सकता है, लेकिन नैतिकता का नहीं। विश्वास न हो, तो अपने शहर के पत्रकारों की गतिविधियों पर ही निगाह डाल दीजिए। ऐसे दागदार मिल जाएंगे, जिन्हें अपने दागों पर कोई शर्म नहीं, उल्टे वे उन दागों को अपनी उपलब्धि बताते हैं।

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