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समय 25 मई 2014 को नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर मेरी पुस्तक का विमोचन इंदौर प्रेस क्लब में हो रहा था, तब इस बात का पूरा अंदाज था कि जिस तूफानी गति से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय किया है, उसी तूफानी गति से वे सरकार भी चलाएंगे। ‘चाय वाले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी : एक तिलिस्म’ शीर्षक से प्रकाशित मेरी यह किताब 25 मई को ही विमोचित हो गई थी, जबकि नरेन्द्र मोदी उसके एक दिन बाद 26 मई को शपथ लेने वाले थे। इस किताब में नरेन्द्र मोदी की चुनावी रणनीति का वर्णन था। हिन्दी में अपने वर्ग की यह बेस्ट सेलर किताब साबित हुई और इसके बाद अनेक भाषाओं में नरेन्द्र मोदी पर सैकड़ों किताबें प्रकाशित हुई। इस किताब के कारण कई लोगों को लगा कि मैं नरेन्द्र मोदी के प्रचार के लिए कार्य करता हूं, जो बिलकुल भी सही नहीं था। वास्तव में किताब पढ़े बिना ही कई लोगों की आदत होती है कि वे लेखक के बारे में धारणाएं बना लेते हैं। मेरी यह किताब पत्रकारीय नजरिये से लिखी गई थी, जिसे अच्छी सराहना प्राप्त हुई।

नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभाले दो साल पूरे हो गए हैं और अब उनके कार्यों की समीक्षा की जा रही है। मैंने अपनी किताब में स्पष्ट किया था कि नरेन्द्र मोदी की सफलता के कारणों में एक कारण सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता भी रहा है। कह सकते हैं कि सोशल मीडिया ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने में अहम भूमिका निभाई। अब यह बात मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि अगर नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बेदखल होने का मौका आया, तो उसके लिए भी सोशल मीडिया ही जिम्मेदार होगा। यह बात और है कि नरेन्द्र मोदी और उनके सलाहकार, भाजपा और उसके सहयोगी दल, आरएसएस और उसके आनुषंगी संगठन सोशल मीडिया पर लगातार यह माहौल बना रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी देश के सबसे सफल और योग्य प्रधानमंत्री हैं।

मोदी सरकार के दो साल होने की खुशी में बड़े जश्न शुरू हो गए है। 15 दिनों तक चलने वाले इन जश्नों में दो सौ से ज्यादा कार्यक्रम हो रहे है। सभी केन्द्रीय मंत्रियों से कहा गया है कि वे अपनी उपलब्धियों का खुलकर बखान करें। शुरूआत टीवी पर इंटरव्यू से हुई है। आगे जाकर जनसभाएं, रैलियां और टीवी पर विशेष कार्यक्रम की रूपरेखा भी बनी है। उद्देश्य है कि मोदी सरकार की कामयाबी को जन-जन तक पहुंचाना। यह सब निरुद्देश्य नहीं हो रहा। आगामी विधानसभा चनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू हो गई लगती है। इसके पहले किसी सरकार ने अपनी कामयाबी का प्रचार करने के लिए इतनी नियोजित योजना नहीं बनाई।

मोदी सरकार की प्रचार की योजनाओं के विरुद्ध विपक्ष मोदी सरकार को असफल तो कहता है, लेकिन सरकार की असफलताओं के प्रचार-प्रसार के लिए कोई विशेष रणनीति नहीं बनाई गई। अब तक सरकारें जो भी काम करती थी, उन्हें सरकार का कर्तव्य समझकर माना जाता रहा। जिस देश में सुई तक नहीं बनती थी, उस देश में टैंक, हवाईजहाज और रॉकेट बनने लगे, लेकिन इस तरह का प्रचार पहले कभी नहीं किया गया। मोदी सरकार प्रचार तंत्र के महत्व को मानती हैं और यह भी जानती है कि लोगों को सोचने के मुद्दे भी वहीं तय करे।

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मोदी सरकार अपनी सफलताओं में स्वच्छ भारत अभियान, घरेलू गैस सिलेंडर को कैश बेनिफिट ट्रांसफर योजना से जोड़ने, रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश, जन-धन योजना, मेक-इन इंडिया, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, डिजिटल इंडिया, प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, स्कील इंडिया, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना आदि को प्रमुखता से गिनती हैं। इनमें से कई योजनाओं की शुरुआत पिछली सरकारों ने ही की थी। उन योजनाओं में से कुछ का तरीका बदला और कुछ का नाम। जेएनएनआरयूएम योजना स्मार्ट सिटी हो गई। मनरेगा और आधार कार्ड योजना अलग तरीके से मेक-अप के बाद पेश की गई। राजीव गांधी की कम्प्यूटर योजनाएं डिजिटल इंडिया में बदल गई और उन्हें प्रचार का मुख्य केन्द्र बनाया गया।

विपक्ष कह रहा है कि मोदी सरकार की जो योजनाएं सफल बताकर प्रचारित की जा रही है, उनमें कई खामियां हैं। प्रधानमंत्री के रूप मेंं नरेन्द्र मोदी कालेधन की वापसी में नाकाम रहे, जिसका वे दावा करते थे। दुनियाभर में घूमने के बावजूद हमारी विदेश नीति में कई कमियां रही, जिनके कारण नेपाल से हमारे संबंध पहले की तुलना में कम अच्छे बचे है और नेपाल चीन की तरफ झुक रहा है। पाकिस्तान के साथ बातचीत होती है और टूट जाती है। दोनों एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहते हैं। आतंकवाद के मुकदमें आगे नहीं बढ़ते। चीन से हमारी दूरी बढ़ती जा रही है और संबंधों में खटास का माहौल है। भारत की सुरक्षा व्यवस्था में कमजोरी आती है, जिसका उदाहरण पठानकोट हमला है। देश में बेरोजगारी की दर पढ़ती जा रही है और महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सका है। इसके उलट महंगाई बहुत तेजी से बढ़ रही है और बड़े उद्योगपति सरकारी योजनाओं का इच्छानुसार लाभ उठा रहे हैं। देश में सहिष्णुता का माहौल कम हुआ है। अच्छे दिन का सपना सपना ही है। लेखक कलाकार और बुद्धिजीवी सरकार के रवैये से खुश नहीं है।

राजनीतिक मोर्चे पर बीजेपी जिस तरह की लोकप्रियता के दावे करती है, वे दावे दिल्ली, बिहार, पुडुचेरी, केरल, तमिलनाडु और बंगाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की असलियत बता देते है। अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा के माहौल की बात भी की जाती है। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ आतंकवादी समर्थक भीड़ हमला करती है और आतंकवादियों को छुड़ा ले जाती है। इसके बावजूद सरकार जम्मू-कश्मीर में कुछ नहीं कर पाती। बीजेपी के सांसद और मंत्री बेलगाम होकर भड़काऊ बयान देते रहते है, जिससे अच्छा खासा माहौल तनावग्रस्त हो जाता है। बीजेपी इन नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। घर वापसी जैसे अभियान सरकार के इरादों को अलग तरीके से बताते हैं। बीफ बैन, ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील, भारत को हिन्दू राष्ट्र कहना, रामजादे बनाम हरामजादे जैसे बयान, रमजान में मुस्लिम कर्मचारियों को जबरन खाना खिलाना, सोशल मीडिया पर शिवाजी के बारे में तस्वीर पोस्ट करने पर मुस्लिम युवक की हत्या, लोगों को पाकिस्तान भेजने की बात आदि वे घटनाक्रम है, जिनसे नरेन्द्र मोदी की सरकार की प्रतिष्ठा में कमी आई।

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एसोचेम ने मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों की समीक्षा करते हुए उसके इस कार्यकाल को दस में से सात नंबर दिए है। एसोचेम का कहना है कि सरकार ने सड़क निर्माण, हाइ-वे, रेलवे, एनर्जी, टैक्सेशन, वि-निवेश और कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण फैसले लिए है। इसलिए एसोचेम को लगता है कि आर्थिक मोर्चे पर यह सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन अभी भी सरकार से यह अपेक्षा है कि वे वि-निवेश, खेती और जीएसटी बिल जैसे मामलों में अच्छे निर्णय करें। मोदी सरकार आम जन से जुड़ने की कोशिश कर रही है और अनेक तरीके से सरकार ने अपने फैसलों में पारदर्शिता प्रदर्शित की है।

मोदी सरकार की दो साल की उपलब्धियों के बारे में दिल्ली में हुए एक सर्वे में 46 प्रतिशत लोगों ने माना की सरकार अपने कामकाज में खरी उतरी है। 36 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकार ने जो भी काम किए है, वे उम्मीद से कम है और 18 प्रतिशत लोगों का कहना है कि मोदी सरकार ने उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा काम किए है। 35 प्रतिशत लोगों का मानना है कि सरकार की कोशिशों से बेरोजगारी की दर में कोई कमी नहीं आई। 43 प्रतिशत मानते है कि सरकार की कोशिशों से महंगाई कम हुई है और 22 प्रतिशत इस बारे में कोई राय नहीं रखते। 55 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि मोदी के राज में महंगाई बढ़ी है। 67 प्रतिशत लोग मानते है कि सरकार के स्वच्छ भारत अभियान से स्वच्छता में वृद्धि हुई है। 61 प्रतिशत लोग यह मानते है कि पिछले दो साल में भ्रष्टाचार थोड़ा कम हुआ है। 66 प्रतिशत लोग यह मानते है कि सांसद अपने क्षेत्र पर पूरा ध्यान नहीं देते। जीएसटी बिल के बारे में 61 प्रतिशत लोग यह मानते है कि यहां मोदी सरकार की नियत साफ थी। 90 प्रतिशत लोग यह मानते है कि नरेन्द्र मोदी के सरकार में आने के बाद भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुधरी है और भारत का दबदबा बढ़ा है।

सर्वे और विपक्ष चाहे जो निष्कर्ष निकालें, यह तय है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली यह सरकार तीन साल तक तो और रहेगी ही। इसकी कोशिश है कि इसके बाद भी बीजेपी को पांच साल और मिलें। अगर यह दस साल मिलते है, तो बाबा रामदेव के शब्दों में ‘भारत वहां पहुंच जाएगा, जहां की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी’।

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