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अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि कश्मीर के हंदवाड़ा में सेना के बंकरों को बुलडोजरों से तबाह कर देना शांति की दिशा में कदम है या अशांति की दिशा में। स्थानीय नेताओं का एक बड़ा वर्ग इसे जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य करने की दिशा में उठाया गया कदम बता रहा है। वक्त ही बताएगा कि इन बंकरों को तबाह करने का फैसला कितना सही था। पहली नजर में मुझे यह एक ऐसा कदम नजर आ रहा है, जो सेना का मनोबल कमजोर करेगा।

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कश्मीर में आतंकवाद से जूझ रही सेना के सामने जितनी बड़ी चुनौती आतंकवाद है, उससे बड़ी चुनौती वहां फैलाई जा रही अफवाहें हैं। आतंकी लोगों को तो सेना गोली से उड़ा सकती है, लेकिन अफवाहों को गोली से नहीं भूना जा सकता। इस बात को अलगाववादी अच्छी तरह जानते हैं। उनके मंसूबों को आगे बढ़ाने का काम वहां की सरकार कर रही है।

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हंदवाड़ा कस्बे में योजनाबद्ध तरीके से यह अफवाह फैलाई गई कि स्कूल जा रही एक लड़की जब वाशरूम गई, तब एक सैन्यकर्मी उसके पीछे चला गया और उसने लड़की के साथ गलत हरकत की। इस मामले पर अफवाहें तेजी से फैली और हिंसक प्रदर्शन होने लगे। पुलिस को और फिर बाद में मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए वीडियो बयान में उस लड़की ने इस बात का खंडन किया कि किसी सैन्यकर्मी ने उसके साथ छेड़छाड़ की। लड़की ने स्पष्ट किया कि गलत हरकत करने वाला एक स्थानीय लड़का ही था। बाद में पुलिस ने उस लड़के को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन तब तक अफवाहें अपना काम कर चुकी थीं। हंदवाड़ा में हिंसक प्रदर्शन होने लगे थे और सैन्य बलों से मुठभेड़ के दौरान चार लोगों को जान गंवानी पड़ी।

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जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हंदवाड़ा का दौरा किया। वे सेना से मुठभेड़ में मारे गए लोगों को घर गई और उनकी हौसला अफजाई की। साथ ही उन्होंने मृतकों को मुआवजा देने का ऐलान भी किया और कहा कि केन्द्र से जो विशेष पैकेज आ रहा है, हम उसका उपयोग करना चाहते थे। हम चाहते थे कि इस इलाके में विकास की बातें करने आए, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे मौके पर आना पड़ा। उन्होंने निश्चित ही कुछ ऐसे फैसले किए, जिसे सेना का मनोबल तोड़ने वाला कहा जा सकता है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर स्थानीय प्रशासन ने सेना के अधिकारियों पर दबाव डाला कि वे हंदवाड़ा से हट जाएं। सेना के स्थानीय अधिकारियों ने कहा कि वे इस बारे में हर फैसला अपने वरिष्ठों पर ही छोड़ेंगे। इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने सैनिकों पर दबाव डाला, जिसे माना नहीं गया। हिंसक भीड़ का सामना सेना को बार-बार करना पड़ा। मुख्यमंत्री की शह पर कुछ अलगाववादी तत्वों के हौसले इतने बढ़ गए कि उन्होंने सेना के बंकरों में आग लगा दी। ये बंकर हंदवाड़ा के बीचों-बीच बने एक पार्क की जगह पर करीब ढाई दशक पहले बने थे। इन बंकरों में बैठकर सेना के जवान हंदवाड़ा पर निगरानी करते थे।

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बंकरों को आग के हवाले करने के बाद भी कुछ लोगों को चैन नहीं था। उन्हें निश्चित ही राज्य सरकार का प्रश्रय प्राप्त था। उन्होंने दबाव डालकर सेना के स्थानीय अधिकारियों से बंकरों पर कब्जा ले लिया और उस स्थान को स्थानीय शासन के हवाले कर दिया। आनन-फानन में फैसला किया गया कि शहर के बीचों-बीच बने इन बंकरों को बुलडोजर से नेस्तनाबूत कर दिया जाए। भारी भीड़ की मौजूदगी में सीमेंट कांक्रीट के उन बंकरों को बुलडोजरों से ध्वस्त कर दिया गया।

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इस अवसर पर स्थानीय लोगों ने नारेबाजी की। सैन्य बलों के बारे में न केवल अपशब्द कहे, बल्कि पथराव भी किया। हिंसक भीड़ ने तलवारों और लाठियों से लैस होकर नारेबाजी की और सैन्य बलों से कहा गया कि वे ‘संयम’ बरतें। महबूबा मुफ्ती ने भीड़ के खिलाफ कार्रवाई करने वाले कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित भी कर दिया।

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करीब एक सप्ताह बाद 21 अप्रैल को हंदवाड़ा सामान्य हुआ। स्कूल खुले, लेकिन वह लड़की स्कूल नहीं पहुंची। उस लड़की ने अब तक दो बयान दिए थे, दोनों में ही उसने कहा था कि उसके साथ अभद्रता करने वाले सैन्यकर्मी नहीं, दूसरे लोग थे, लेकिन फिर भी अफवाह फैलाने वालों ने चैन की सांस नहीं ली और वे बार-बार यही प्रचारित करते रहे कि लड़की के साथ अभद्रता करने वाले सैनिक ही थे। लड़की ने जो बयान दिए वे दबाव में आकर दिए। सैन्य बलों के गोली चालन में मरने वाले एक युवा क्रिकेटर के नाम के बैनर-पोस्टर अब बंकर वाली जगह पर लगे हैं और उस लड़के को शहीद बताया जा रहा है।

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भारतीय सैन्य बल जम्मू-कश्मीर में सिर्फ सीमाओं की निगरानी ही नहीं करते। वे आतंकवादियों से लड़ते हैं। बाढ़ जैसी विपदा आने पर वे लोगों की जान बचाते हैं। बीमारों के लिए स्वास्थ्य शिविर लगाते हैं। बच्चों को पोलियो की दवा पिलाते हैं। कई जगह स्कूलों का संचालन भी करते हैं। सेना की उपस्थिति के कारण भी श्रीनगर जैसे शहर जीरो क्राइम शहर माने जाते हैं। इस सबके बावजूद सेना को नीचा दिखाने के लिए कुछ लोग अफवाहों का सहारा लेते है। ये अफवाहें महिलाओं से छेड़छाड़, पोलियो की दवा में जहर, अस्पताल में दवा के नाम पर नुकसान पहुंचाने वाले तत्व बांटने जैसे होते हैं। अफवाहें फैलाने वालों का लक्ष्य होता है कि ऐसी बात हो, जिससे आम आदमी की नाराजी बढ़े और सीधे-सीधे सैन्य बलों को अपराधी करार दिया जा सके। सैन्य बलों के विशेष अधिकारों के खिलाफ भी स्थानीय लोगों का एक बड़ा वर्ग आवाज उठाता रहा है।

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श्रीनगर की दीवारों पर लिखे नारे...

फोटो- डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

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