
भोपाल में सम्पन्न 10वां विश्व हिन्दी सम्मेलन कितना कामयाब रहा, इसके बारे में अलग-अलग दावे है। सफलता का दावा करने वालोंं ने कहा है कि इस सम्मेलन में हिन्दी के विकास को लेकर समग्र परिपेक्ष्य में हिन्दी पर चर्चा हुई। यह पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन था, जिसमें हिन्दी के विकास, विस्तार, प्रभाव, विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी के उपयोग जैसे विषयों के साथ ही हिन्दी की सहोदरी भाषाओं के विकास पर भी चर्चा हुई। इस आयोजन को विफल बताने वाले कहते हैं कि यह एक राजनैतिक सम्मेलन की तरह सम्पन्न हुआ। उनका यह भी कहना है कि यह सम्मेलन एक इवेंट था। जिसमें बड़े-बड़े दावे और आत्मप्रचार सबकुछ था। अमिताभ बच्चन इस समारोह में नहीं आए, यह भी बताता है कि कार्यक्रम को लेकर सेलेब्रिटीज में कोई बहुत उत्साह नहीं था।

विश्व हिन्दी सम्मेलन शुरू होने के पहले ही कुछ साहित्यकार विरोध में खड़े हो गए थे। पद्मश्री मंजूर एहतेशाम, रमेशचन्द्र शाह, मेहरुन्निसा परवेज और ज्ञान चतुर्वेदी के साथ ही साहित्य अकादमी से सम्मानित राजेश जोशी, कुमार अंबुज, गोविन्द मिश्र जैसे रचनाकारों ने आरोप लगाया कि उनकी उपेक्षा की गई। सम्मेलन शुरू होने के ठीक एक दिन पहले भोपाल के रवीन्द्र भवन में साहित्यकारों ने एक पत्रकारवार्ता भी कर डाली और कहा कि यह सम्मेलन राजनीति से प्रेरित है और इसमें साहित्यकारों की घोर उपेक्षा की जा रही है।
नरेन्द्र कोहली और जावेद अख्तर जैसे लेखकों ने बयान दिए कि अगर साहित्यकारों को बुलाया नहीं गया था, तो वे अपना नाम पंजीकरण कराने के बाद जा सकते थे, इसमें उपेक्षा जैसी कोई बात नहीं मानी जानी चाहिए, क्योंकि समारोह में कोई भी हिन्दीसेवी पंजीकरण कराने के बाद जा सकते थे। आयोजकों ने इस पर अपनी सफाई दी कि यह आयोजन हिन्दी के विकास को लेकर किया जाने वाला आयोजन हैं। यह कोई साहित्यकार सम्मेलन नहीं है।

विवाद बहुत बढ़ गया, जब विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह ने आपसी बातचीत में किसी से कहा कि कुछ लोगों को लग रहा था कि वे आते थे, शराब पीते थे, आलेख पढ़ते थे या कविता सुनाते थे और चले जाते थे, ऐसा इस बार नहीं होने वाला है। कुछ साहित्यकारों ने यह बात दिल पर ले ली और कहा कि यह साहित्य का अपमान है। मीडिया की अपनी शिकायतें थी। मीडिया को इस पूरे आयोजन में केवल उद्घाटन और समापन सत्र में ही रहने की अनुमति थी। हिन्दी से जुड़े विभिन्न मामलों में बारह सत्रों मे ंसे किसी में भी मीडिया के प्रवेश की अनुमति नहीं थी। बाद में सफाई दी गई कि मीडिया उन चर्चा सत्रों में उपस्थित रह सकता है, लेकिन वहां होने वाली चर्चा में भाग नहीं ले सकता। केवल रिपोर्टिंग के परपस से मीडिया को अनुमति दी गई है।
कार्यक्रम का उद्घाटन जिस प्रभावी ढंग से हुआ, वह अद्भुत था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उद्घाटन के दौरान अपने संबोधन में करीब आधे घंटे तक एक-एक शब्द नापतोल कर कहा। प्रधानमंत्री होने के नाते वे केवल हिन्दी के विस्तार की बात नहीं कर सकते थे। उन्होंने हिन्दी के विकास को भारतीय भाषाओं से जोड़ा। हिन्दी भाषा में तमिल, बंगाली, मराठी और दूसरी भाषाओं के शब्दों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की। हिन्दी के शब्द सामथ्र्य की प्रशंसा की। हिन्दी की सरलता का भी बखान किया और कहा कि मैंने चाय बेचते-बेचते हिन्दी सीखी हैं।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपने संक्षिप्त भाषण में इस सम्मेलन को लेकर एक-एक चर्चा सत्र का बखान किया। बिना अटके और बिना कागज देखे उन्होंने सभी बारह सत्रों के विषयों की व्याख्या कर दी। प्रशासन में हिन्दी, गिरमिटिया देशों में हिन्दी, विदेश में हिन्दी, अनुवाद में हिन्दी, विदेश में हिन्दी शिक्षण, विधि में हिन्दी, जैसे सभी विषयों पर उन्होंने संक्षिप्त प्रकाश डाला।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने संक्षिप्त भाषण में भोपाल के अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा हिन्दी में पढ़ाई जाने वाली चिकित्सा शिक्षा की तरफ ध्यान दिलाया। मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि मध्यप्रदेश में हिन्दी भाषा में चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी की शिक्षा भी दी जाएगी और सरकार हिन्दी में अपना संपूर्ण कामकाज करेगी।

कई क्षिद्रान्वेषी पत्रकारों को प्रधानमंत्री की बात में कमी निकालने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि आधे घंटे में प्रधानमंत्री ने 56 अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग किया। प्रधानमंत्री द्वारा हिन्दी के शब्द सामथ्र्य की सराहना करने का तरीका भी उन्हें पसंद नहीं आया। बुद्धिजीवियों की शिकायत तो नरेन्द्र मोदी से इस बात को लेकर थी कि पूरे भोपाल में प्रधानमंत्री के स्वागत के होर्डिंग और बैनर क्यों लगे हैं?
उन्हें इस बात पर भी आपत्ति थी कि पंजीकरण शुल्क के नाम पर पांच-पांच हजार रुपए क्यों जमाए करवाए गए। यह बात और है कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में पंजीकरण शुल्क एक सामान्य प्रक्रिया है और विश्व हिन्दी सम्मेलन भी इसका अपवाद नहीं था। विश्व हिन्दी सम्मेलन के विरोधियों का कहना था कि सरकार को इस सम्मेलन के बाद एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। इस श्वेत पत्र में सफाई देनी चाहिए कि विभिन्न आरोपों से घिरी सरकार इस आयोजन के बारे में क्या कहती है। इस सम्मेलन से हिन्दी का कितना भला होगा, हिन्दी साहित्य कितनी तरक्की करेगा, इस आयोजन के बाद हिन्दी का मान-सम्मान कितना बढ़ेगा आदि।

विश्व हिन्दी सम्मेलन में 39 देशों के करीब सवा सौ हिन्दी विद्वानों ने अपनी बात कहीं। पहली बार ऐसा हुआ है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के बाद प्रस्ताव पारित किए गए और उन प्रस्तावों पर अमल करने का फैसला किया गया।
अमेरिका के न्यू जर्सी में रटगर्स विश्वविद्यालय के सहयोग से आमंत्रित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में चार महीने पहले ही– ‘हिन्दी का विकास; संभावनाएं और चुनौतियां’ पर चर्चा हुई थी, लगभग उन्हीं मुद्दों पर भोपाल के विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी चर्चा हुई। भोपाल में सम्मेलन हिन्दी के विस्तार और संभावनाओं पर केन्द्रित था।
भोपाल का सम्मेलन भारत सरकार के सहयोग से आयोजित था और वहां निर्णय लेने और उस पर अमल करने का काम सरकारी विभागों को भी करना है। भोपाल का आयोजन भव्यतम था। यहां आने वालों को मध्यप्रदेश की विशेष झलक देखने को मिली। सम्मेलन में आए अतिथियों ने हिन्दी के नाम पर गढ़े गए अनावश्यक और अवैज्ञानिक शब्दों पर भी विचार किया। जैसे अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय के विज्ञापन में ई-मेल की जगह अणु डाक जैसे शब्दों का उपयोग करना। सत्यव्रत चतुर्वेदी ने एक चर्चा सत्र में कहा कि हम लोगों को प्रेमचंद की हिन्दी बोलनी चाहिए, जयशंकर प्रसाद की हिन्दी नहीं।
एक बड़ी विसंगति यह है कि हिन्दी भाषी लोग सरकार पर हिन्दी की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं, लेकिन जब भी सरकार इस बारे में कोई पहल करती है, तब वे यह कहकर विरोध प्रकट करने लगते है कि हिन्दी के विकास में सरकार आड़े न आए और हिन्दी को अपना विकास खुद करने दें।

भोपाल के विश्व हिन्दी सम्मेलन में पुस्तक प्रदर्शनी और बिक्री जैसे आयोजन नहीं किए गए। इस पर भी प्रकाशको के एक वर्ग और लेखकों को आपत्ति थी। उनका कहना था कि ऐसे मौके हिन्दी के विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। तकनीक के क्षेत्र में हिन्दी की आवश्यकता को देखते हुए विश्व की तमाम बड़ी कंपनियां अलग-अलग स्तर पर काम कर रही है। तकनीक के क्षेत्र में इन कंपनियों के काम को प्रदर्शित करने के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान एक विशेष पंडाल तैयार किया गया था, जहां गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, वेबदुनिया, सीडैक जैसी कंपनियों के साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा, अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्याल भोपाल आदि के पंडाल संयोजित थे। मध्यप्रदेश पर्यटन ने इस मौके पर विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन आयोजित किए। इस पर भी बुद्धिजीवियों को आपत्ति थी। गूगल और मााइक्रोसॉफ्ट जैसी वंâपनियों के हिन्दी में किए गए कार्यों को उन्होंने बाजारवाद करार दिया।
इस सम्मेलन में विभिन्न सभागृहों के नाम हिन्दी के जाने-माने साहित्यकारों और पत्रकारों के नाम पर रखे गए थे। उन विदेशी हिन्दी सेवकों को भी याद किया गया जिन्होंने हिन्दी के लिए कार्य किया। इस मौके पर प्रतिभागियों को दिए गए स्मृति चिन्ह में हिन्दी के प्रमुख सेवियों के बारे में जानकारी दी गई थी। हिन्दी सेवकों के बारे में एक सचित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गई थी।
ऐसे सम्मेलन होते रहेंगे, राजनीति भी होगी, इवेंट भी होंगे, सरकारी आयोजन पर लोगों को शिकायतें भी होगी, उपेक्षा का आरोप भी लगेगा, अंग्रेजी शब्दों पर आरोप भी लगेंगे, पुस्तक विक्रेता और प्रकाशक नाराज भी होंगे- सबकुछ होता रहेगा, मूल बात यह है कि हिन्दी आगे बढ़ती रहे और हिन्दी का मार्ग प्रशस्त होता रहे।