
25 सांसदों के निलंबन को लेकर लोकसभा में चल रहे गतिरोध के बारे में सोशल मीडिया में जगह-जगह यह टिप्पणी आ रही है कि सदन का कामकाज न होने पर सांसदों का वेतन काट लेना चाहिए। ऐसी टिप्पणी अपरिपक्वता की निशानी है। हमारे माननीय सांसद देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंच हैं, कोई मनरेगा के मजदूर नहीं। संसद में होने वाले विवाद, परिवाद, विरोध प्रदर्शन आदि सभी गतिविधियां हमारे लोकतंत्र का एक हिस्सा है। संसद का बहिष्कार करना भी सदस्यों की एक गतिविधि है। संसद सदस्य लोकसभा में भले ही मौजूद न हो, संसद भवन परिसर में गांधी प्रतिमा के समक्ष मौजूद है और विरोध का कार्य कर रहे है। यह विरोध ही लोकतंत्र की शक्ति है। विरोध किस विषय पर हो रहा है यह चर्चा का विषय हो सकता है।
संसद की गतिविधियों को लेकर सोशल मीडिया में और कई बार मास मीडिया में भी ऐसी टिप्पणियां आती है, जो बताती है कि हमें एक लोकतंत्र के नाते अभी और भी परिपक्व होना है। संसद में सदस्यों को गड्ढे नहीं खोदने है और ना ही नहरे बनानी है। उन्हें वहां देश के विभिन्न मुद्दों पर विचार व्यक्त करना है, विरोध या समर्थन करना है, कानून बनाना है। ऐसा भी नहीं है कि पहली बार लोकसभा की स्पीकर ने किन्हीं सदस्यों का निलंबन किया हो। पिछली लोकसभा में भी ऐसे मौके आ चुके है। एनडीए की सरकार आज जिस तरीके से निलंबन पर टिप्पणियां व्यक्त कर रही है और संसद नहीं चलने देने के लिए विपक्ष को दोषी कह रही है। पिछली लोकसभा में विपक्ष में रहते हुए उन्होंने भी यहीं सब किया था। पन्द्रहवीं लोकसभा के मानसून सत्र में केवल छह दिन काम हुआ और 13 दिन तक हंगामा हुआ था। पन्द्रह विधेयक पेश किए जाने थे, लेकिन चार ही पेश हो सकें। सदस्यों ने ३९९ तारंकित प्रश्नों की सूची तैयार की थी। जिसमें से 11 प्रश्नों के जवाब ही मिल पाएं। 4 सप्ताह चलने वाला मानसून सत्र तीन सप्ताह तक हंगामों में लगा रहा। 1952 से अब तक सबसे कम काम पन्द्रहवीं लोकसभा में मानसून सत्र में हुआ था।
लोकसभा के तीन सत्र और राज्यसभा के दो सत्रों में सदस्यों को करीब 125 दिन चर्चाओं में हिस्सा लेना होता है। 1950 के दशक में लोकसभा की बैठकें औसतन 127 दिन तक चलती थी। अब यह घटकर 70 के आसपास सीमट गई है। 2008 में बहुत ही बूरे हाल थे, जब लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें केवल 46 दिन ही हो पाई। इस सब के पीछे विभिन्न कारण है और वे सभी कारण लोकतांत्रिक है, इसी व्यवस्था का हिस्सा है, जो हमने स्वीकार किया है।
लोकसभा की कार्यवाही बाधित होने की खबर के साथ ही हिन्दी न्यूज चैनल दिखाने लग जाते है कि सदन में गतिरोध से 70 करोड़ का नुकसान या सदन में गतिरोध से एक दिन का फलां-फलां धनराशि का नुकसान। कुछ टीवी चैनल तो घंटे, मिनट तक लगाकर बता देते है कि सदन की एक दिन की कार्यवाही पर कितना पैसा खर्च होता है और इससे कितना नुकसान हो चुका है। ऐसी तमाम खबरें हास्यास्पद लगती है, क्योंकि सदन की कार्रवाई का मूल्यांकन रुपए पैसे में नहीं किया जा सकता। अगर सदन 365 में से 365 दिन ही चलें और गलत फैसले लिए जाए, तो क्या कोई चैनल यह दिखाएगा कि सदन पर खर्चे की पूरी वसूली हो गई?
इसी तरह सोशल मीडिया पर सांसदों के वेतन को लेकर भी टिप्पणियां करते रहते है। उन्हें लगता है कि देश की सारी संपदा इन्हीं सांसदों के वेतन भत्तों पर खर्च हो रही है। वास्तव में ऐसा है नहीं। सांसदों से ज्यादा वेतन और खर्चे हमारी नौकरशाही में खर्च हो रहे है। वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के यहां 20-25 सरकारी कर्मचारियों की फौज सेवा में लगी रहती है। अगर उन सब का वेतन और अन्य सुविधाएं उस आईएएस या आईपीएस के वेतन में जोड़ दी जाए, तो वह राशि प्रतिवर्ष करोड़ रुपए से भी अधिक की बैठेगी। इन अफसरों को अपने चुनाव क्षेत्र से आए दर्जनों लोगों को हर रोज चाय, नाश्ता और भोजन आदि पर खर्च नहीं करना पड़ता, लेकिन इन नौकरशाहों के प्रति लोगों के मन में इस तरह की कोई भावना नहीं है। जबकि यह बात साबित हो चुकी है कि भारतीय नौकरशाही दुनिया की भ्रष्टतम नौकरशाही में शामिल है। कई अफसर तो दिनभर में एक घंटा भी कार्य नहीं करते। इनकी नौकरी इतनी पक्की है कि इन्हें हटाना भी हो तो राष्ट्रपति की मंजूरी लगती है और ये लोग आजीवन तनख्वाह लेते है और रिटायर्ड होने के बाद मोटी पेंशन। नोएडा के यादव सिंह, मध्यप्रदेश के अरविंद और टीनू जोशी इसके उदाहरण है।
एक और बात सोशल मीडिया पर अक्सर आती है कि सांसदों को इतना सस्ता भोजन क्यों? शायद लोगों को यह बात पता नहीं है कि रियायती दरों पर मिलने वाला यह भोजन केवल सांसदों के लिए नहीं, बल्कि वहां आने वाले अतिथियों और कर्मचारियों के लिए भी है। संसद की सुरक्षा और व्यवस्था में जितने लोग शामिल है, उनकी संख्या सांसदों से दस गुना से भी ज्यादा है। अधिकांश संस्थानों में सेवारत कर्मचारियों के लिए सस्ती कैंटीन की व्यवस्था आम है। इसलिए संसद की कैंटीन की सब्सिडी पर आपत्ति करना औचित्यहीन लगता है।
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